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Sri Suktam 16 Mantra Pdf – संस्कृत साहित्य में वेदों को बहुत उच्च मान्यता मिलती है। वेदों में से एक वेद ‘रिग्वेद’ है जिसमें सृष्टि की रचना की गई है। इस वेद में से ‘स्री सूक्तम’ नामक सूक्ति बहुत जानी जाती है। इस लेख में हम आपको Sri Suktam 16 Mantra Pdf और इसके महत्व के बारे में बताएंगे।

ध्यान रखें कि Sri Suktam 16 Mantra Pdf के जप के लिए सबसे अधिक उपयुक्त समय सुबह और शाम का होता है। इस वजह से सुबह उठकर या संध्या के समय इसे जप किया जाता है। स्री सूक्तम का जप करने से जीवन में सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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श्री सूक्त 16 मंत्र | Sri Suktam 16 Mantra pdf in Hindi Download

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PDF Name श्री सूक्त 16 मंत्र | Sri Suktam 16 Mantra PdfNo. of Pages –PDF Size 0.20 MBLanguage HindiCategory Religious and PDFSource pdffile.co.inDownload Link Available

श्री सूक्त 16 मंत्र | Sri Suktam 16 Mantra Hindi PDF Summary

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Sri Suktam 16 Mantra Pdf वैदिक संस्कृत श्लोक हैं जिनका जप करने से धन, समृद्धि, स्वास्थ्य, सुख और शांति की प्राप्ति होती है। इन मंत्रों को सबसे अधिक सफलता के साथ सुबह और शाम के समय जप किया जाता है। श्री सूक्तम में अलग-अलग देवी-देवताओं की महिमा का वर्णन है जो विविध वस्तुओं से संबद्ध हैं। इस लेख में हम आपको श्री सूक्तम के 16 मंत्रों का अर्थ विस्तार से बताएंगे।

दोस्तों आज हम आपके लिए Sri Suktam 16 Mantra Pdf / श्री सूक्त 16 मंत्र PDF हिंदी भाषा में लेकर आएं हैं । श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण इस प्रकार मिलता है:-‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिये ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिये लक्ष्मी का सृजन कर सकता है। श्रीसूक्त में सोलह मंत्र हैं। इस सूक्त का पाठ अगर पूरी श्रद्धा से किया जाए तो मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं और साधक को धन-संपत्ति प्रदान करती हैं।

Sri Suktam 16 Mantra pdf

श्री सूक्त 16 मंत्र PDF हिंदी भाषा में | Sri Suktam 16 Mantra Hindi PDF

– ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं, सुवर्णरजतस्त्रजाम् ।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आ वह ।।

अर्थ➠ हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव! आप सुवर्ण के समान रंगवाली, किंचित् हरितवर्णविशिष्टा, सोने और चाँदी के हार पहननेवाली, चन्द्रवत् प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवी का मेरे लिये आह्वान करें।

2- तां म आ वह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।।

अर्थ➠ हे अग्ने! उन लक्ष्मीदेवी का, जिनका कभी विनाश नहीं होता तथा जिनके आगमन से मैं स्वर्ण, गौ, घोड़े तथा पुत्रादि प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आह्वान करें।

3- अश्वपूर्वां रथमध्यां, हस्तिनादप्रमोदिनीम् ।

श्रियं देवीमुप ह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।।

अर्थ➠ जिनके आगे घोड़े और रथ के मध्य में वे स्वयं विराजमान रहती हैं। जो हस्तिनाद सुनकर प्रमुदित (प्रसन्न) होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आह्वान करता हूँ। लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों

4- कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।

पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ।।

अर्थ➠ जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुस्कुरानेवाली, सोने के आवरण से आवृत्त, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, भक्तनुग्रहकारिणी, कमल के आसन पर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मैं यहाँ आह्वान करता हूँ।

5- चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।

तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ।।

अर्थ➠ मैं चन्द्र के समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, यश से दीप्तिमती, स्वर्गलोक में देवगणों द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मीदेवी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ। मेरा दारिद्र्य दूर हो जाये। मैं आपको शरण्य के रूप में वरण करता हूँ।

6- आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः ।

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः

अर्थ➠ सूर्य के समान प्रकाशस्वरूपे! आपके ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल आपके अनुग्रह से हमारे बाहरी और भीतरी दारिद्र्य को दूर करें।

7- उपैतु मां दैवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह ।

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ।।

अर्थ➠ हे देवि! देवसखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष-प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों अर्थात् मुझे धन और यश की प्राप्ति हो। मैं इस राष्ट्र (देश) में उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें।

8- क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।

अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वां निर्णुद मे गृहात् ।।

अर्थ➠ लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी (दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी) का, जो क्षुधा और पिपासा से मलिन-क्षीणकाया रहती है, उसका नाश चाहता हूँ। हे देवि! मेरे घर से हर प्रकार के दारिद्र्य और अमंगल को दूर करो।

9- गन्धद्वारां दुराधर्षां, नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।

ईश्वरीं सर्वभूतानां, तामिहोप ह्वये श्रियम् ।।

अर्थ➠ जिनका प्रवेशद्वार सुगन्धित है, जो दुराधर्षा (कठिनता से प्राप्त हो) तथा नित्यपुष्टा हैं, जो गोमय के बीच निवास करती हैं, सब भूतों की स्वामिनी उन लक्ष्मीदेवी का मैं आह्वान करता हूँ।

10- मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि ।

पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।।

अर्थ➠ मन की कामना, संकल्प-सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो। गौ आदि पशुओं एवं विभिन्न अन्नों भोग्य पदार्थों के रूप में तथा यश के रूप में श्रीदेवी हमारे यहाँ आगमन करें।

।। इति समाप्ति ।।

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श्री सूक्त क्या है? What Is Sri Suktam

श्री सूक्त एक प्रसिद्ध संस्कृत मंत्र है जो माता लक्ष्मी की स्तुति के रूप में जाना जाता है। इस मंत्र का उद्गम ऋग्वेद से हुआ है और यह देवी लक्ष्मी को जल, पृथ्वी, आकाश और सूर्य जैसी भौतिक और आध्यात्मिक सुख-समृद्धि की देवी के रूप में स्तुति करता है। श्री सूक्त में लक्ष्मी माता को समृद्धि, सौभाग्य, शक्ति, सौंदर्य और धन-वृद्धि की देवी के रूप में स्तुति किया गया है।

यह मंत्र शास्त्रों में सबसे उच्च मान्यता वाले मंत्रों में से एक है और इसका प्रभाव सभी जातियों, वर्गों और धर्मों में मान्य है। इस मंत्र का नियमित जप उपयोगी और सकारात्मक परिणाम दे ता है जो एक व्यक्ति को समृद्धि, धन, सौभाग्य, शांति और समृद्ध जीवन की प्राप्ति में सक्षम बनाता है।

श्री सूक्त का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

श्री सूक्त का पाठ नियमित रूप से किया जाना चाहिए। इसका प्रतिदिन अल्पकालिक पाठ करना बेहतर होता है। इस मंत्र का पाठ दोपहर के समय या सूर्यास्त के बाद किया जाना चाहिए। सबसे अधिक फलदायक श्री सूक्त का 108 बार पाठ किया जाना है। इसके अलावा 16, 32 और 64 बार का पाठ भी किया जा सकता है।

conclusion

Sri Suktam 16 Mantra Pdf / श्री सूक्त 16 मंत्र PDF हिंदी भाषा में लेकर आएं हैं । श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण इस प्रकार मिलता है:-‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिये ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिये लक्ष्मी का सृजन कर सकता है। श्रीसूक्त में सोलह मंत्र हैं। इस सूक्त का पाठ अगर पूरी श्रद्धा से किया जाए तो मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं और साधक को धन-संपत्ति प्रदान करती हैं।

FAQ

श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ कैसे करें?

स्नान के बाद सफेद वस्त्र पहनकर घर में पूजा स्थान या फिर लक्ष्मी जी के मंदिर में ये पाठ करने उत्तम माना जाता है. देवी लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजन कर लक्ष्मी जी के समक्ष घी का दीपक लगाएं. फिर श्री सूक्त पाठ की शुरुआत करें. ये पाठ जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए, इसके गलत उच्चारण से पाठ का फल नहीं मिलेगा

श्री सूक्त का पाठ करने से क्या फल मिलता है?

यह श्री सूक्त (Shree Suktam in Hindi Arth Sahit) माता लक्ष्मी जी को अतिप्रिय है। जो नियमित रूप से श्रीसूक्त का पाठ करता है माता लक्ष्मी उस पर सदैन प्रसन्न रहती है और गरीबी को दूर करके धन, सम्पत्ति और वैभव प्रदान करती है। श्री सूक्त के मंगलकारी मंत्रों का पाठ लक्ष्मी प्रप्ति के लिए अत्यन्त शुभ माना जाता है।

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